
Shri Krishna Janma Katha | भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पावन कथा
मथुरा की कारागार से गोकुल तक भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य जन्म की संपूर्ण पावन कहानी
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष | भगवान विष्णु के आठवें अवतार की अद्भुत कथा और आध्यात्मिक संदेश
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भारतीय सनातन धर्म की सबसे पवित्र और प्रेरणादायक घटनाओं में से एक माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण को प्रेम, करुणा, धर्म, ज्ञान और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनका जीवन केवल एक धार्मिक कथा नहीं, बल्कि मानव जीवन को सही दिशा दिखाने वाला महान संदेश है।
श्रीमद्भागवत महापुराण सहित अनेक हिंदू धार्मिक ग्रंथों में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म, उनके बचपन और दिव्य लीलाओं का वर्णन मिलता है। मान्यता है कि जब पृथ्वी पर अधर्म और अत्याचार बढ़ गया था, तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लेकर धर्म की स्थापना का संकल्प लिया।
इस लेख में जानिए भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की पूरी कथा, राजा कंस के अत्याचार, देवकी और वसुदेव की भक्ति, आधी रात का दिव्य जन्म, यमुना नदी की अद्भुत घटना और गोकुल में नंद बाबा तथा माता यशोदा के घर उनके आगमन की कहानी।
श्रीकृष्ण जन्म कथा की शुरुआत कैसे हुई?
प्राचीन काल में मथुरा नगरी में उग्रसेन नाम के एक राजा का शासन था। उनके पुत्र कंस ने अपने पिता को सत्ता से हटाकर स्वयं मथुरा का राजा बनना शुरू कर दिया। कंस अत्यंत शक्तिशाली था, लेकिन उसके स्वभाव में अहंकार, क्रूरता और सत्ता का घमंड था।
उसकी बहन देवकी का विवाह यदुवंश के वीर और धर्मात्मा वसुदेव से हुआ। देवकी और वसुदेव के विवाह के बाद मथुरा में उत्सव का वातावरण था। राजा कंस अपनी बहन से बहुत स्नेह करता था। इसलिए उसने स्वयं देवकी और वसुदेव के रथ की बागडोर संभाली और उन्हें उनके नए जीवन की ओर ले जाने लगा।
लेकिन उसी समय आकाशवाणी हुई। आकाश से एक गंभीर आवाज सुनाई दी, जिसने कंस के जीवन की दिशा बदल दी।
हे कंस! जिस देवकी को तुम इतने प्रेम से विदा कर रहे हो, उसी देवकी की आठवीं संतान तुम्हारे विनाश का कारण बनेगी।
यह सुनते ही कंस भय और क्रोध से भर गया। जिस बहन को वह प्रेम करता था, उसी को अपने शत्रु के जन्म का कारण समझने लगा। उसने तुरंत तलवार निकालकर देवकी को मारने का प्रयास किया।
राजा कंस का अत्याचार और देवकी-वसुदेव की प्रतिज्ञा
वसुदेव ने जब देखा कि कंस अपनी ही बहन की हत्या करने जा रहा है, तो उन्होंने उसे समझाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि किसी निर्दोष स्त्री की हत्या करना महान पाप है। उन्होंने कंस को यह भी आश्वासन दिया कि देवकी की प्रत्येक संतान जन्म लेने के बाद उसके सामने प्रस्तुत कर दी जाएगी।
वसुदेव की बात सुनकर कंस ने उस समय देवकी को मारने का विचार छोड़ दिया। लेकिन उसका भय समाप्त नहीं हुआ। उसने देवकी और वसुदेव को मथुरा के कारागार में बंद कर दिया।
समय बीतता गया और देवकी ने एक-एक करके संतानों को जन्म दिया। कंस ने आकाशवाणी के भय में देवकी की पहली छह संतानों का वध कर दिया। इस प्रकार मथुरा की धरती पर अत्याचार का अंधकार और गहरा होता गया।
देवकी और वसुदेव अपने बच्चों को खोने के दुख में भी भगवान पर विश्वास बनाए रहे। वे जानते थे कि संसार में कोई भी शक्ति ईश्वर की इच्छा से बड़ी नहीं है।
सातवीं संतान और भगवान बलराम का प्राकट्य
जब देवकी की सातवीं संतान गर्भ में आई, तब भगवान की योगमाया ने अद्भुत लीला की। धार्मिक परंपरा के अनुसार उस गर्भ को देवकी से रोहिणी के गर्भ में स्थानांतरित कर दिया गया। रोहिणी उस समय गोकुल में नंद बाबा के संरक्षण में रह रही थीं।
इस प्रकार देवकी की सातवीं संतान के रूप में गर्भ में स्थित भगवान के अंश का जन्म रोहिणी से हुआ। यही बालक आगे चलकर बलराम कहलाए। उन्हें भगवान श्रीकृष्ण का बड़ा भाई माना जाता है।
कंस को लगा कि देवकी की सातवीं संतान गर्भ में ही समाप्त हो गई है। इसलिए वह कुछ समय के लिए निश्चिंत हो गया। लेकिन उसे यह पता नहीं था कि उसकी मृत्यु का कारण बनने वाली आठवीं संतान का आगमन निकट है।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का दिव्य समय
समय के साथ देवकी आठवीं बार गर्भवती हुईं। इस बार कारागार के भीतर एक अद्भुत शांति और दिव्यता का अनुभव होने लगा। देवकी और वसुदेव के हृदय में विश्वास जाग उठा कि अब भगवान की इच्छा से कुछ असाधारण होने वाला है।
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी। रात्रि का समय था। चारों ओर घना अंधकार छाया हुआ था। मथुरा की कारागार में पहरेदार तैनात थे और कंस के सैनिक हर गतिविधि पर नजर रख रहे थे।
आधी रात के समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान विष्णु ने अपने दिव्य स्वरूप में देवकी और वसुदेव को दर्शन दिए। उन्होंने बताया कि वे धर्म की स्थापना और पृथ्वी को अत्याचार से मुक्त करने के लिए अवतरित हुए हैं।
यह मंत्र भगवान श्रीकृष्ण के प्रति समर्पण और भक्ति का प्रतीक माना जाता है। भक्तजन इसे श्रद्धापूर्वक जपते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म होते ही कारागार में चमत्कार
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद कारागार का वातावरण बदल गया। मान्यता के अनुसार कारागार के पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वसुदेव की बेड़ियां अपने आप खुल गईं और कारागार के द्वार भी खुल गए।
वसुदेव समझ गए कि यह सब भगवान की दिव्य इच्छा से हो रहा है। उन्हें अपने पुत्र को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाने का आदेश मिला। उन्होंने नवजात श्रीकृष्ण को एक टोकरी में रखा और गोकुल की ओर चल पड़े।
बाहर तेज वर्षा हो रही थी। यमुना नदी उफान पर थी। रात इतनी अंधेरी थी कि रास्ता दिखाई देना भी कठिन था। फिर भी वसुदेव अपने पुत्र को लेकर आगे बढ़ते रहे।
शेषनाग ने भगवान श्रीकृष्ण की रक्षा की
जब वसुदेव यमुना नदी के किनारे पहुंचे, तब नदी का जल बहुत ऊंचा था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे नवजात बालक को लेकर नदी कैसे पार करेंगे। लेकिन भगवान की इच्छा से उन्होंने नदी में प्रवेश किया।
धार्मिक कथा के अनुसार जब वर्षा तेज हुई, तब शेषनाग ने अपने विशाल फनों को फैलाकर भगवान श्रीकृष्ण के ऊपर छत्र बना दिया। इससे वर्षा की बूंदें बालक तक नहीं पहुंचीं।
यमुना नदी का जल धीरे-धीरे रास्ता देने लगा। वसुदेव आगे बढ़ते रहे और अंततः सुरक्षित रूप से गोकुल पहुंच गए।
गोकुल में नंद बाबा और माता यशोदा के घर आगमन
गोकुल में उस समय नंद बाबा और माता यशोदा के घर एक कन्या का जन्म हुआ था। पूरा गोकुल आनंद और उत्सव के वातावरण में था। वसुदेव ने भगवान श्रीकृष्ण को वहां पहुंचाकर उस नवजात कन्या को अपने साथ ले लिया।
इसके बाद वे पुनः मथुरा की कारागार में लौट आए। वहां पहुंचते ही कारागार के द्वार बंद हो गए और बेड़ियां फिर से बंध गईं। पहरेदारों की नींद खुल गई।
जब कंस को पता चला कि देवकी ने आठवीं संतान को जन्म दिया है, तो वह तुरंत कारागार पहुंचा। देवकी ने उससे विनती की कि इस बार जन्मी संतान एक कन्या है, इसलिए उसे जीवित छोड़ दिया जाए। लेकिन कंस ने उनकी बात नहीं मानी।
योगमाया का दिव्य प्राकट्य
कंस ने जैसे ही उस कन्या को मारने का प्रयास किया, वह उसके हाथों से छूटकर आकाश में प्रकट हुई। धार्मिक कथा के अनुसार वह योगमाया थीं। उन्होंने कंस को बताया कि उसका विनाश करने वाला जन्म ले चुका है और वह कहीं सुरक्षित स्थान पर पहुंच चुका है।
यह सुनकर कंस भयभीत हो गया। उसे समझ आ गया कि वह जिस बालक को मारना चाहता था, वह अब उसके हाथों से दूर जा चुका है।
इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण गोकुल में नंद बाबा और माता यशोदा के घर पलने लगे।
गोकुल में श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव
गोकुल में जब नंद बाबा को पुत्र प्राप्ति का समाचार मिला, तो पूरे गांव में आनंद छा गया। ग्वाल-बाल, गोपियां और परिवार के सदस्य उत्सव मनाने लगे। घरों को सजाया गया और मंगल गीत गाए गए।
नंद बाबा ने दान-पुण्य किया और पूरे गोकुल में मिठाइयां बांटी गईं। इसी आनंदमय घटना के कारण भगवान श्रीकृष्ण को नंदलाल और नंदकिशोर के नाम से भी पुकारा जाता है।
माता यशोदा ने श्रीकृष्ण को अपने पुत्र के समान प्रेम दिया। उनके लिए बालकृष्ण केवल एक बच्चा थे, लेकिन भक्तों के लिए वे स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का आध्यात्मिक महत्व
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म केवल एक ऐतिहासिक या पौराणिक घटना के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि इसका आध्यात्मिक संदेश बहुत गहरा है। श्रीकृष्ण का प्राकट्य धर्म, न्याय, प्रेम और करुणा की स्थापना का प्रतीक है।
1. अधर्म पर धर्म की विजय
कंस का अत्याचार अधर्म और अहंकार का प्रतीक माना जाता है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म इस विश्वास को मजबूत करता है कि अन्याय और अत्याचार हमेशा स्थायी नहीं होते।
2. ईश्वर पर विश्वास
वसुदेव और देवकी ने कठिन परिस्थितियों में भी अपना विश्वास नहीं खोया। उनकी कथा भक्तों को सिखाती है कि संकट के समय धैर्य और श्रद्धा बनाए रखना महत्वपूर्ण है।
3. प्रेम और करुणा का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण का बाल रूप प्रेम, आनंद और निष्कपटता का प्रतीक है। गोकुल की लीलाएं भक्तों को प्रेम और सरलता का महत्व समझाती हैं।
4. सत्य और न्याय का महत्व
श्रीकृष्ण के जीवन में सत्य और धर्म की रक्षा का संदेश बार-बार दिखाई देता है। महाभारत में उन्होंने अर्जुन को कर्म और धर्म का ज्ञान दिया।
5. जीवन में कर्म का महत्व
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने निष्काम कर्म का उपदेश दिया। उनका संदेश है कि मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए और फल की अत्यधिक चिंता में नहीं उलझना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को जन्माष्टमी क्यों कहते हैं?
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में हुआ माना जाता है। इसी कारण इस पावन पर्व को जन्माष्टमी कहा जाता है। इसे श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, गोकुलाष्टमी और कृष्णाष्टमी जैसे नामों से भी जाना जाता है।
भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इस त्योहार को अलग-अलग परंपराओं से मनाया जाता है। मथुरा और वृंदावन में विशेष उत्सव आयोजित किए जाते हैं। मंदिरों में भजन, कीर्तन, झांकियां और मध्यरात्रि जन्मोत्सव होता है।
जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा कैसे करें?
भक्तजन जन्माष्टमी के दिन सुबह स्नान करके भगवान श्रीकृष्ण की पूजा का संकल्प लेते हैं। घर के मंदिर को फूलों और दीपों से सजाया जाता है। बाल गोपाल की प्रतिमा को सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाए जाते हैं।
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- पूजा स्थान को साफ करके भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें।
- फूल, तुलसी दल और फल अर्पित करें।
- भगवान के समक्ष दीपक और धूप जलाएं।
- श्रीकृष्ण मंत्र और भजन का पाठ करें।
- मध्यरात्रि में भगवान के जन्म का उत्सव मनाएं।
- परंपरा के अनुसार प्रसाद वितरित करें।
पूजा के नियम परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
श्रीकृष्ण के प्रसिद्ध नाम और उनके अर्थ
| नाम | अर्थ |
|---|---|
| कृष्ण | आकर्षित करने वाले परमात्मा |
| गोविंद | गौ और इंद्रियों के रक्षक |
| गोपाला | गौओं की रक्षा करने वाले |
| मुरलीधर | बांसुरी धारण करने वाले |
| नंदलाल | नंद बाबा के प्रिय पुत्र |
| वासुदेव | वसुदेव के पुत्र |
| माधव | भगवान कृष्ण का एक प्रसिद्ध नाम |
श्रीकृष्ण जन्म कथा से हमें क्या सीख मिलती है?
भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कथा हमें कई महत्वपूर्ण जीवन मूल्य सिखाती है। देवकी और वसुदेव की भक्ति, नंद बाबा और माता यशोदा का प्रेम तथा भगवान की लीलाएं हमें विश्वास, धैर्य, करुणा और समर्पण का महत्व समझाती हैं।
यह कथा बताती है कि कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को आशा नहीं छोड़नी चाहिए। सत्य और धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। अहंकार और अत्याचार का अंत निश्चित है, जबकि प्रेम और सद्भावना सदैव महत्वपूर्ण रहते हैं।
अपने कर्तव्य का पालन करो, सत्य का साथ दो, प्रेम और करुणा को जीवन में स्थान दो तथा हर परिस्थिति में धर्म के मार्ग पर चलने का प्रयास करो।
Frequently Asked Questions (FAQs)
1. भगवान श्रीकृष्ण का जन्म कहां हुआ था?
हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म उत्तर प्रदेश के मथुरा नगर में कंस के कारागार में हुआ था।
2. भगवान श्रीकृष्ण के माता-पिता कौन थे?
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदाता माता देवकी और पिता वसुदेव थे। उनका पालन-पोषण गोकुल में माता यशोदा और नंद बाबा ने किया।
3. भगवान श्रीकृष्ण का जन्म किस तिथि को हुआ था?
परंपरागत मान्यता के अनुसार उनका जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि की मध्यरात्रि में हुआ था।
4. कंस भगवान श्रीकृष्ण को क्यों मारना चाहता था?
आकाशवाणी में कंस को बताया गया था कि देवकी की आठवीं संतान उसका वध करेगी। इसी भय से वह देवकी की संतानों को मारना चाहता था।
5. भगवान श्रीकृष्ण को गोकुल कौन लेकर गया था?
भगवान श्रीकृष्ण को उनके पिता वसुदेव मथुरा की कारागार से गोकुल लेकर गए थे।
6. भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई कौन थे?
भगवान बलराम श्रीकृष्ण के बड़े भाई थे। धार्मिक परंपरा के अनुसार उनका जन्म रोहिणी माता से हुआ था।
7. भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव किस नाम से मनाया जाता है?
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कहा जाता है।
8. श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर कौन सा मंत्र जपना चाहिए?
भक्तजन ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करते हैं।
9. भगवान श्रीकृष्ण को किसका अवतार माना जाता है?
हिंदू धर्म की वैष्णव परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।
10. श्रीकृष्ण जन्म कथा किस धार्मिक ग्रंथ में मिलती है?
श्रीमद्भागवत महापुराण, हरिवंश और महाभारत सहित अनेक धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में श्रीकृष्ण के जीवन का वर्णन मिलता है।
निष्कर्ष: भगवान श्रीकृष्ण का जन्म धर्म और प्रेम का संदेश है
भगवान श्रीकृष्ण की जन्म कथा हमें याद दिलाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, सत्य, धर्म और विश्वास का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए। मथुरा की कारागार से गोकुल तक की उनकी दिव्य यात्रा भक्तों के लिए आशा और आस्था का प्रतीक है।
देवकी और वसुदेव का समर्पण, नंद बाबा और माता यशोदा का वात्सल्य तथा भगवान श्रीकृष्ण का दिव्य प्राकट्य भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में सदैव श्रद्धा से याद किया जाता है।
इसीलिए हर वर्ष लाखों भक्त श्रीकृष्ण जन्माष्टमी को बड़े प्रेम और उत्साह से मनाते हैं तथा भगवान से सुख, शांति और सद्बुद्धि की प्रार्थना करते हैं।
॥ हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
मथुरा की कारागार से गोकुल तक भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य जन्म की संपूर्ण पावन कहानी
भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है। हिंदू मान्यताओं के अनुसार इसी पावन तिथि की मध्यरात्रि में, रोहिणी नक्षत्र के समय भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा के कारागार में माता देवकी और पिता वसुदेव के यहां हुआ था।जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व नहीं है, बल्कि यह धर्म की अधर्म पर विजय, सत्य की असत्य पर जीत और आशा के अंधकार पर प्रकाश की विजय का भी प्रतीक है।
श्रीकृष्ण जन्म की कथा

द्वापर युग में मथुरा पर भोजवंशी राजा उग्रसेन का शासन था। उनके पुत्र कंस ने सत्ता के लालच में अपने पिता को गद्दी से हटाकर स्वयं मथुरा का राजा बन लिया।कंस की बहन देवकी का विवाह यदुवंशी सरदार वसुदेव से हुआ था। विवाह के बाद जब कंस अपनी बहन देवकी और वसुदेव को विदा करने जा रहा था, तभी आकाशवाणी हुई —
“हे कंस! जिस देवकी को तू प्रेमपूर्वक विदा कर रहा है, उसी की आठवीं संतान तेरे विनाश का कारण बनेगी।”
यह सुनकर कंस क्रोधित हो उठा और उसने वसुदेव को मारने का प्रयास किया।
तब देवकी ने कंस से विनती की कि वह उसकी संतानों को जन्म के बाद उसके हवाले कर देगी। कंस ने उस समय वसुदेव को तो नहीं मारा, लेकिन दोनों को कारागार में बंद कर दिया।
कंस का अत्याचार

समय बीतने के साथ देवकी और वसुदेव की संतानें जन्म लेने लगीं। कंस ने भविष्यवाणी के भय से उनके जन्म लेते ही बच्चों को मार दिया।
इस प्रकार देवकी की कई संतानों का वध कर दिया गया और जब उनकी आठवीं संतान के जन्म का समय आया, तब कारागार की सुरक्षा और भी कड़ी कर दी गई।
लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
भगवान श्रीकृष्ण का अवतार
मध्यरात्रि के समय कारागार में दिव्य प्रकाश फैला और भगवान विष्णु ने अपने चतुर्भुज स्वरूप में देवकी और वसुदेव को दर्शन दिए। उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतरित हुए हैं।भगवान ने वसुदेव से कहा कि वे नवजात बालक को गोकुल में अपने मित्र नंद के घर पहुंचा दें और वहां जन्मी कन्या को लेकर वापस कारागार आ जाएं।कहा जाता है कि भगवान की दिव्य माया से कारागार के पहरेदार गहरी नींद में सो गए और कारागार के द्वार स्वयं खुल गए।
मध्यरात्रि के समय कारागार में दिव्य प्रकाश फैला और भगवान विष्णु ने अपने चतुर्भुज स्वरूप में देवकी और वसुदेव को दर्शन दिए। उन्होंने उन्हें आश्वासन दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतरित हुए हैं।भगवान ने वसुदेव से कहा कि वे नवजात बालक को गोकुल में अपने मित्र नंद के घर पहुंचा दें और वहां जन्मी कन्या को लेकर वापस कारागार आ जाएं।कहा जाता है कि भगवान की दिव्य माया से कारागार के पहरेदार गहरी नींद में सो गए और कारागार के द्वार स्वयं खुल गए।
वसुदेव का यमुना पार करना
वसुदेव नवजात श्रीकृष्ण को एक टोकरी में लेकर कारागार से बाहर निकले। बाहर घनघोर वर्षा हो रही थी और यमुना नदी उफान पर थी।फिर भी वसुदेव भगवान पर विश्वास रखते हुए यमुना पार करने निकल पड़े। मान्यताओं के अनुसार भगवान शेषनाग ने अपने फन फैलाकर बालक श्रीकृष्ण को वर्षा से सुरक्षित रखा और यमुना ने भी उन्हें पार जाने का मार्ग दिया।वसुदेव गोकुल पहुंचकर बालक श्रीकृष्ण को नंद और यशोदा के यहां छोड़ आए तथा वहां जन्मी कन्या को लेकर वापस मथुरा के कारागार में आ गए।

कंस को मिला भविष्यवाणी का संकेत
जब कंस को देवकी की आठवीं संतान के जन्म की सूचना मिली तो वह तुरंत कारागार पहुंचा। उसने नवजात कन्या को मारने का प्रयास किया।लेकिन वह कन्या उसके हाथ से छूटकर आकाश में चली गई और उसने कंस को चेतावनी दी कि—
“हे मूर्ख! तेरा काल जन्म ले चुका है और वह सुरक्षित स्थान पर पहुंच चुका है। जल्द ही तुझे तेरे कर्मों का फल मिलेगा।”
यहीं से भगवान श्रीकृष्ण के जीवन की वह दिव्य यात्रा शुरू हुई, जिसने आगे चलकर अधर्म के विनाश और धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का संदेश
भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हमें यह संदेश देता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, सत्य, धर्म और न्याय की विजय अंततः निश्चित होती है।
जन्माष्टमी का पर्व हमें भगवान श्रीकृष्ण के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाने और प्रेम, करुणा, ज्ञान एवं धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।
जय श्रीकृष्ण।
