श्री हनुमान साठिका एवं संकटमोचन हनुमान अष्टक
🙏 सम्पूर्ण पाठ, दोहा, चौपाइयाँ और धार्मिक महत्त्व 🙏
॥ श्री हनुमते नमः ॥
भगवान श्री हनुमान जी को शक्ति, साहस, ज्ञान, सेवा और अनन्य श्रीराम भक्ति का प्रतीक माना जाता है। हनुमान साठिका और संकटमोचन हनुमान अष्टक उनकी महिमा का गुणगान करने वाली प्रसिद्ध भक्तिपूर्ण स्तुतियाँ हैं।
इस पेज पर दोनों पाठ एक साथ दिए गए हैं, ताकि भक्त श्रद्धापूर्वक इनका पाठ कर सकें।
॥ श्री हनुमान साठिका ॥
हनुमान साठिका में 60 चौपाइयों के माध्यम से पवनपुत्र हनुमान जी के पराक्रम, श्रीराम भक्ति और भक्तों के संकट दूर करने वाले स्वरूप का वर्णन किया गया है।
प्रारंभिक दोहा
धन्य-धन्य अंजनि-तनय, संकर, हर, हनुमान॥
॥ चौपाई ॥
महावीर विक्रम बजरंगी॥
जय जगबन्दन सील अगारा॥
अरि मरदन जय-जय गिरधारी॥
जय-जयकार देवतन कीन्हा॥
सुर मन हर्ष असुर मन पीरा॥
छूटे बंध देवतन जानी॥
पवन तनय के पद सिर नाये॥
निर्मल नाम धरा हनुमाना॥
दीन्ह बताय लाल फल खाना॥
रवि रथ उदय लाल फल जाना॥
सूर्य बिना भये अति अंधियारा॥
तब कपीस की अस्तुति ठाना॥
चतुरानन तब रवि उगिलावा॥
रामचन्द्र करिहैं बहु लीला॥
अबहीं बसहु कानन महँ जाई॥
मिले सखा संग पवन कुमारा॥
ढेर करैं बहु पर्वत फोरैं॥
गिरि समेत पातालहि जाई॥
निरखत रहे राम मगु आसा॥
अति आनन्द सप्रेम दुलारा॥
सीता खोज चले सिरु नाई॥
अगम अपार देवतन हारा॥
लाँघि गये कपि कहि जगदीशा॥
अजर अमर के आसिस पाये॥
एक से एक महाभट भारी॥
दहेउ लंक कोप्यो भुज बीसा॥
रामचन्द्र के पद सिर नाये॥
बाँधे सेतु निमिष इक माहीं॥
राम बुलाय कहा पुनि तबहीं॥
तुरत सजीवन को पुनि धाये॥
अमित सुभट निसिचर संहारा॥
धरि दीन्हों जहँ कृपा निकेता॥
वर्षि सुमन सुर जय जय कीन्हा॥
लै गयो तहँ पाताल निकेता॥
दीन चहै बलि काढ़ी कृपाना॥
कटक समेत निसाचर मारी॥
राम लखन कीने यक ठोरी॥
सो कीरति मुनि नारद गाये॥
कालकेतु कहँ सब जग जाना॥
ताहि निपात कीन्ह कपिराई॥
पवन तनय तब सो बरियारा॥
पल में हते ताहि हनुमाना॥
पवन तनय सब मारि नसावा॥
नाम कृसानु सोक सम तूला॥
रवि तम सम सो संकट खोई॥
संकट कटै धरै जो ध्याना॥
मारुतसुत व्याकुल बहु कीन्हा॥
अच्छत तुम्हें मोर यह हाला॥
सादर सुरपति कीन बखाना॥
ध्यान धरै हनुमान जती को॥
कहौं पवनसुत जुगकर जोरी॥
आतुर आइ दुसह दुःख हरहु॥
जवन गुहार लाग सिय जाया॥
भव बन्धन भंजन हनुमाना॥
नाम तुम्हार जगत सुखदाता॥
बार अनेक नमामि नमामी॥
धूप दीप नैवेद्य सुजाना॥
सुन नर मुनि वांछित फल पावे॥
समरथ पुरुष सुअन्तरयामी॥
सो तुलसी के प्राण समाना॥
समापन दोहा
राम लषन सीता सहित, सदा करो कल्याण॥
बन्दौं हनुमत नाम यह, भौमवार परमान।
ध्यान धरै नर निश्चय, पावै पद कल्याण॥
जो नित पढ़ै यह साठिका, तुलसी कहैं बिचारि।
रहै न संकट ताहि को, साक्षी हैं त्रिपुरारि॥
सवैया
अंगद औ नल-नील महाबलि देव सदा बल की बलिहारी॥
जाम्बवन्त सुग्रीव पवनसुत दिबिद मयंद महा भटभारी।
दुःख दोष हरो तुलसी जन को श्री द्वादश बीरन की बलिहारी॥
॥ श्री संकटमोचन हनुमान अष्टक ॥
संकटमोचन हनुमान अष्टक गोस्वामी तुलसीदास जी से संबद्ध आठ छंदों की प्रसिद्ध स्तुति है। प्रत्येक छंद के अंत में हनुमान जी को संकटमोचन कहकर स्मरण किया गया है।
प्रथम छंद
ताहि सों त्रास भयो जग को, यह संकट काहु सों जात न टारो॥
देवन आनि करी बिनती तब, छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
द्वितीय छंद
चौंकि महामुनि शाप दियो तब, चाहिय कौन बिचार बिचारो॥
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु, सो तुम दास के शोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
तृतीय छंद
जीवत ना बचिहौ हम सों जु, बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो॥
हेरि थके तट सिंधु सबै तब, लाय सिया-सुधि प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
चतुर्थ छंद
ताहि समय हनुमान महाप्रभु, जाय महा रजनीचर मारो॥
चाहत सीय अशोक सों आगि सु, दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
पंचम छंद
लै गृह बैद्य सुषेन समेत, तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो॥
आनि सजीवन हाथ दई तब, लछिमन के तुम प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
षष्ठ छंद
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल, मोह भयो यह संकट भारो॥
आनि खगेस तबै हनुमान जु, बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
सप्तम छंद
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि, देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो॥
जाय सहाय भयो तब ही, अहिरावन सैन्य समेत सँहारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
अष्टम छंद
कौन सो संकट मोर गरीब को, जो तुमसों नहिं जात है टारो॥
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु, जो कछु संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जग में कपि, संकटमोचन नाम तिहारो॥
समापन दोहा
बज्र देह दानव दलन, जय जय जय कपि सूर॥
हनुमान जी के पाठ की विधि
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- हनुमान जी के चित्र या प्रतिमा के सामने दीप जलाएं।
- श्रीराम और हनुमान जी का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
- हनुमान साठिका और संकटमोचन अष्टक का शांत मन से पाठ करें।
- अंत में हनुमान जी को प्रणाम करके अपनी प्रार्थना करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
हनुमान साठिका में कितनी चौपाइयाँ हैं?
प्रचलित पाठ में 60 चौपाइयाँ होती हैं। इनके साथ दोहे और सवैया भी शामिल हैं।
संकटमोचन हनुमान अष्टक में कितने छंद हैं?
इसमें आठ मुख्य छंद हैं और अंत में एक समापन दोहा है।
हनुमान साठिका का पाठ कब करना चाहिए?
भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार किसी भी दिन इसका पाठ कर सकते हैं। मंगलवार को विशेष रूप से हनुमान जी की पूजा की जाती है।
क्या हनुमान साठिका और संकटमोचन अष्टक एक साथ पढ़ सकते हैं?
हाँ, भक्त अपनी श्रद्धा और समय के अनुसार दोनों स्तुतियों का पाठ कर सकते हैं।
संकटमोचन अष्टक किसने रचा?
यह स्तुति परंपरागत रूप से गोस्वामी तुलसीदास जी से संबद्ध मानी जाती है।
